Secrets Behind Space Station Creation

स्पेस स्टेशन का आईडिया कहां से आया। हिटलर ने स्पेस स्टेशन के बीज क्यों बोए थे? हमें तो यह बताया गया था कि सबसे पहले अपर एटमॉस्फेयर में एनिमल्स गए थे। यह झूठ है। सबसे पहले इंसान ही गए थे और वहां जाकर फंस भी गए। आइए आपको सारा सच बताता हूं। तो जी कहानी की शुरुआत होती है 1930 में। दुनिया भर में। लोगों को नई-नई चीज खोजने का भूत सवार था। अब यहां पर कहानी में एंट्री होती है अगस्त पिकार्ड की। यह भाई साहब सोच रहे थे कि स्पेस में ऑक्सीजन कहां तक मिलेगी? टेंपरेचर कितना होगा? रेडिएशन का क्या असर होगा? और आखिरकार हम स्पेस में जाएं कैसे? अब यह भाई साहब अपना झोला उठाकर दुनिया भर में पैसे मांगने निकल पड़े। अलग-अलग यूनिवर्सिटीज हो गई, सरकार हो गई, नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी हो गई। कोई तो पैसे दे दो। मैं निग्नता के लिए काम कर रहा हूं। सब के सब ने पैसा देने से मना कर दिया। बोला यहीं खुजा लो मतलब खोज लो जो खोजना है। स्पेस में क्या रखा है? इसके बाद एंट्री होती है जर्मन एयरफोर्स लुफाफे की। हिटलर नाजी पार्टी बना चुका था लेकिन सत्ता पर कब्जा नहीं किया था। वैसे लुफाफे का नामकरण तो 1 मार्च 1935 में हुआ था। लेकिन इसका जन्म वर्ल्ड वॉर वन के बाद ही कर दिया गया था और हिटलर सीधे तौर पर लुफाफे से जुड़ा हुआ था। अब जर्मन एयरफोर्स को उस जमाने के हिसाब से तगड़े फाइटर प्लेन चाहिए थे।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों चाहिए थे? तो इसके पीछे भी एक जबरदस्त कहानी है। अब सुनो ध्यान से। देखो आपके भी दिमाग में कभी ना कभी यह सवाल जरूर आया होगा कि हिटलर को ऐसी क्या खुजली थी जो वो पूरे वेस्टर्न वर्ल्ड की कंसरी कूट ने चल दिया। आइए बताता हूं। तो जी जर्मनी के द्वारा इस मार कुटाई का कारण था एक कागज का टुकड़ा जिसका नाम था वर्सलीज का समझौता जो जर्मनी को मजबूरी में वर्ल्ड वॉर वन के हारने पर करना पड़ा। समझौते के हिसाब से जर्मनी की सेना को लगभग खत्म कर दिया गया। जर्मनी की बहुत सारी जमीन को फ्रांस, पोलैंड, डेनमार्क में बांट दिया गया और हां, बेल्जियम को भी टुकड़ा मिला था। जर्मनी से उसी कॉलोनीज़ यानी कि उसके गुलाम देशों को छीन लिया गया और वर्ल्ड वॉर वन में हुए सारे नुकसान का ठप्पा भी जर्मनी के माथे पर छाप दिया गया। जिसकी वजह से जर्मनी से भारी भरकम मुआवजा वसूला गया। जर्मनी को इस सबकी कीमत चुकानी पड़ेगी। आज के समय जो यूनाइटेड नॉनसेंस है उसके पिताजी यानी कि लीग ऑफ नेशंस की स्थापना भी इसी समझौते की वजह से हुई थी। अब इन सारी चीजों ने जर्मनी की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया और जर्मन लोगों के मन में बदले और नफरत को जन्म दिया और इसी की वजह से हिटलर को सत्ता में आने का मौका मिल गया। लेकिन सत्ता में आने से पहले ही हिटलर जर्मन एयरफोर्स के साथ उसे बेहतर बनाने के लिए माथापच्ची कर रहा था। तो हिटलर ने भी पूछ लिया कि भैया और बेहतर प्लेन कैसे बनाएं? तो इसके लिए जर्मन इंजीनियर्स को पता करना था कि हाई एटीट्यूड में प्लेन कितनी देर तक टिकेगा? कितना तेल खाएगा? तापमान कितना बदलेगा? और पायलट के लिए लाइफ सपोर्ट सिस्टम किस तरीके से बनाया जाएगा? यह सारी जानकारी भविष्य के फाइटर प्लेेंस और बॉम्बर्स के लिए किसी सोने की खदान से कम नहीं थी। अब हवाई जहाज बनाने के लिए जो ज्ञान चाहिए था वो पिकिका दे सकता था और पिकार्ड को अपनी खुराफात को मिटाने के लिए जो पैसा चाहिए था वो जर्मनी के लुफाफे दे सकती थी और बस दोनों का फायदा था। दोनों ने हाथ मिला लिया। एक दूसरे की मदद के लिए तैयार हो गए।

लेट्स सील द डील। अब पिकिका भाई साहब और उनके असिस्टेंट पॉल काफर ने एक एल्युमिनियम का गोला बनाया। जर्मन वेदर ऑफिसर्स ने मौसम और हवा की दिशा से जुड़ी हुई जानकारी जुटाई। पिकार्ड भाई साहब ने अपने आप को गोले के अंदर बंद किया और जर्मनी के ऑस्बर्ग से एक हाइड्रोजन बैलून की मदद से गोले को 27 मई 1931 को लॉन्च करवा दिया। अब देखो आपको लग रहा होगा कि यह भाई साहब ऊपर गए होंगे। भाई साहब ने फिर ऊपर जाकर हिसाब किताब का पर्चा भरा होगा और आराम से टहलते हुए धरती पर वापस आ गए होंगे और फिर हीरो जैसा एटीट्यूड मारा होगा। वेल ऐसा तो हुआ ना बल्कि इनके क्रियाक्रम का कार्यक्रम सेट हो गया था। धरती पर जर्मन मिलिट्री ने इनकी चिता की पूरी तैयारी कर ली थी। मिलिट्री को लगता था कि भैया अपना वैज्ञानिक तो जिंदा वापस आता ना और गए अपने पैसे। अब आगे हुआ क्या यह भी बताऊंगा उससे पहले एक और कमाल की जानकारी सुनो। देखो विज्ञान में ज्यादातर चीजों की खोज ना एक्सीडेंट से हुई है। अब पिकार्ड बाबू तो हाइड्रोजन बैलून के नीचे लटक कर ऊपर निकल लिए। लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि इंसानों को यह बात कैसे पता लगी कि भाई हम जमीन से ऊपर उठ सकते हैं। यानी कि ऊपर जा सकते हैं? देखो बात है 1782 की। फ्रांस में दो भाई थे जेक और जोसेफ मोंट गोल्फर।

इनका परिवार कागज वगैरह बनाने का काम करता था। अब एक दिन मौसम खराब हो गया। बारिश वगैरह पड़ गई। बारिश आने वाली है कपड़े अंदर लेच लो। तो जो कपड़े गीले हो रहे थे ये उन्हें लेकर अंदर आ गए। अब अंगीठी की आंच के आसपास जब इन्होंने कपड़े सुखाए तो गर्म हवा की वजह से कपड़े धीरे-धीरे ऊपर उठने लगे। अब जोसेफ ने यह सब कुछ देख लिया। उसके दिमाग ने यह समझ लिया कि गर्म हवा चीजों को ऊपर उठाती है और यहीं से आईडिया लेकर मॉनट गोल्फर भाइयों ने हॉट एयर बैलून की खोज कर दी। लेकिन कोई भी इनके तामझाम में बैठे ना। बारिश के ₹5 बारिश के ₹5 आओ जल्दी बेंचो। अब ये खबर फ्रांस के राजा के कानों तक पहुंच गई। उस समय फ्रांस के राजा लुईस 16 थे। उन्होंने इनसे कहा कि बेटा तुम्हारा यह उड़न खटोला सुरक्षित है या नहीं? पहले यह साबित करो। और तब इन्होंने एक बत्तख, एक मुर्गा और एक भेड़ को अपने उड़न खटोले में बिठाया और 1.5 कि.मी. की ऊंचाई तक उड़ा दिया। और जब ये तामझाम नीचे आया तभी से हॉट एयर बैलून का सिक्का चल निकला। यहीं से गर्म हवा के गुब्बारों पर यात्राओं की शुरुआत हुई थी और इसके बाद हवा से हल्की गैसे जैसे हीलियम और हाइड्रोजन के बड़े-बड़े गुब्बारे बनाकर यात्राएं शुरू हुई जिन्हें बाद में जेप्लिन कहा गया। अब वापस चलते हैं अपनी कहानी पर। तो जी अपने वैज्ञानिक महोदय 15 कि.मी. की ऊंचाई तक अपने गोले को लेकर पहुंच गए और वहां जाने पर उसमें छेद हो गया। उसमें से ऑक्सीजन लीक होने लगी। बाहर का तापमान -60 जिसकी वजह से अंदर कंडेंसेशन होने लगा। यानी हवा में मौजूद नमी पानी बनने लगी।

अब कमाल की बात तो यह थी कि पिकिका बाबू अपने असिस्टेंट को भी साथ लेकर गए थे। इन दोनों ने ही मिलकर सारे तामझाम को डिजाइन किया था। पॉल काइफर ने पिकार्ड से कहा, महाराज आज मरेंगे। अब हम ना बचेंगे। पर भाई साहब पिकिका कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। अपने वैज्ञानिक ने कॉटन और वैसलीन की मदद से पहले लीकेज को रोका। फिर अपने प्रयोग की सारी जानकारी को इकट्ठा किया और फिर पॉल काफर से कहा कि अपने वाहन को धरती की तरफ ले चलो। लेकिन अब इनका वाहन नखरे दिखा गया। इनका गोला अपनी जगह से हिले ना। यह अपर एटमॉस्फेयर में ही अटक गया और नीचे जर्मन मिलिट्री भी टेंशन में आ गई। भाई साहब 8 घंटे का मिशन था। 17 घंटे निकल गए थे। धरती पर सबको यह लग रहा था कि ये महाराज ऊपर के चक्कर में ऊपर ही तो ना निकल गए। मतलब भाई साहब इन्हें ऊपर भेजने में मोटा खर्चा हुआ था। मिलिट्री को लगा कि पैसा बर्बाद हो गया। पूरा जर्मन मीडिया साइंटिफिक कम्युनिटी अल्बर्ट आइंस्टाइन। हां जी। पिकिका बाबू से अल्बर्ट आइंस्टाइन की बड़ी पक्की यारी थी। क्योंकि अल्बर्ट आइंस्टाइन को महान अल्बर्ट आइंस्टाइन बनाने में आइंस्टाइन की थ्योरीज को सही साबित करने में पिकिका बहुत बड़ा योगदान था। लेकिन ये कहानी फिर कभी और सुनाऊंगा।

अभी के लिए जरा यह समझो कि आखिर 16 कि.मी. की ऊंचाई पर ऐसा हुआ क्या था जो अपना वैज्ञानिक वहां लटक गया। देखो आपको पता होगा कि अगर प्रेशर कम हो जाए तो गैस एक्सपेंड होने लगती है, फैलने लगती है। अब क्योंकि ये अपर एटमॉस्फेयर में थे तो वहां पर प्रेशर कम था। जिसकी वजह से इनका जो बैलून था वो फूल कर कुपा हो गया। मतलब इनके द्वारा लगाए गए सारे हिसाब किताब से भी ज्यादा वो फैल गया। अब देखो इनसे पहले इतना ऊपर कोई गया तो था नहीं। तो किसी को आईडिया भी नहीं था कि ऊपर जाने पर आखिर होगा क्या? बस यहीं से सारा मामला बिगड़ गया। अब इन्हें नीचे आने के लिए अपने गुब्बारे में से गैस को रिलीज करना था। लेकिन क्योंकि बाहर का टेंपरेचर -60 था तो पूरा का पूरा तामझाम जम गया और अब गैस रिलीज ना हो। अब देखो दो ही रास्ते थे। या तो मरो या किस्मत पर भरोसा रखकर कोशिश करो। अब पिकार्ड और उनके असिस्टेंट बाबू ने गोले के अंदर जो भी सामान रखा था उसको एक साइड लगाया जिसकी वजह से गोला एक साइड को टिल्ट हो गया और जो खिड़की थी उससे सूरज की रोशनी सीधी अंदर आने लगी। फिर उस रोशनी को रिफ्लेक्टर्स की मदद से जो जमा हुआ सिस्टम था यानी कि गैस को रिलीज़ करने के जो वाल्व थे उन पर मारा गया ताकि वेंट पर लगी हुई बर्फ जो है पिघल जाए। अब बर्फ पिघली या नहीं पिघली यह बाद में बताऊंगा। एक जानकारी देना भूल गया था पहले वह बता देता हूं। जर्मनी के इस एक्सपेरिमेंट की खबर सोवियत यूनियन और अमेरिका दोनों को लग गई थी और अमेरिका और सोवियत यूनियन दोनों के पेट में गुड़-गड़ी शुरू हो गई।

इन दोनों देशों ने ही अपने-अपने वैज्ञानिकों को फरमान जारी कर दिया कि बेटा तैयारी करो अपन भी ऊपर जाएंगे और यहां से जो रेस शुरू हुई थी वो आज भी जारी है। वैसे इन्होंने क्या करा यह भी बताऊंगा। लेकिन अभी के लिए पिकिका कहानी पर चलते हैं। भाई साहब कई घंटे इन्होंने सूरज की धूप को सीधा वेंट पर मारा और इनका तुक्का चल निकला। धीरे-धीरे गैस रिलीज हुई और ये नीचे आने लगे। लेकिन तेज हवाएं इन्हें ईस्टर्न यूरोप की तरफ धकेल कर ले गई और ये अपने टारगेट लोकेशन से 500 कि.मी. दूर जाकर गिरे। फिर लोकल लोगों ने इन्हें देखा और मदद और बचाव करने के लिए वो लोग निकल पड़े और इस तरीके से ये धरती पर वापस लौट कर आए। इन्होंने वहां से इकट्ठा की हुई जानकारी जर्मनी को दी और उसी से और उसी से जर्मनी बेहतर फाइटर प्लेन बना पाया। इसके बाद रॉकेट मिसाइल और भविष्य के स्पेस मिशन भी इनके द्वारा दी गई जानकारी के दम पर ही खड़े हुए थे। अब ये सारी खबर पहुंच गई सोवियत यूनियन। वहां पर सबके कान खड़े हो गए और 2 जनवरी 1934 को सोवियत यूनियन वाले ओसो वाइकिम नाम का अपना गंडोला लेकर ऊपर पहुंच गए। ये जो एलुमिनियम का गोला था जिसके अंदर यह बैठकर गए थे।

इसी को गंडोला कहते हैं। अब देखो सोवियत यूनियन वाले ऊपर तो पहुंच गए। पिकार्ड का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया लेकिन जिंदा नहीं बच पाए क्योंकि इन्होंने एक बहुत बड़ी गलती कर दी थी। क्या? अब जरा यह सुनो। देखो मैंने आपको यह बताया था कि ऊपर प्रेशर कम होता है इसलिए गैस एक्सपेंड होती है। इनका बैलून भी एक्सपेंड हुआ था। लेकिन रिकॉर्ड तोड़ने के चक्कर में यह जरूरत से ज्यादा ऊंचाई पर चले गए। लगभग 22 कि.मी. ऊपर। इसी वजह से इनका जो बैलून था वो कुछ ज्यादा ही एक्सपेंड हो गया। जिसकी वजह से उसके अंदर माइक्रो टियर्स बन गए। जिससे गैस लीक होने लगी। लेकिन यह बात कैबिन के अंदर बैठी हुई क्रू को नहीं पता था। अब सोवियत साइंटिस्ट ने नीचे आने के लिए वॉल्व खोलकर गैस को रिलीज करना शुरू करा। अब गोला धीरे-धीरे नीचे आना शुरू करता है। लेकिन जब आप नीचे आते हो तो एटमॉस्फेयर की डेंसिटी बढ़ती है। उसका प्रेशर बढ़ता है और अब इनके गुब्बारे पर लगने वाला प्रेशर भी बढ़ गया। जिसकी वजह से इनके गुब्बारे का साइज काफी छोटा हो गया। और क्योंकि माइक्रो टियर्स की वजह से काफी गैस एटमॉस्फेयर में रिलीज हो चुकी थी। तो हवा में तैरने के लिए इन्हें जो बायनसी चाहिए थी वो इन्हें ना मिल पाई और अब इनका यह गोला गोली की रफ्तार से जमीन से आकर टकराता है और सब के सब मारे जाते हैं। यह उस समय की बहुत बड़ी घटना थी जिसे सोवियत यूनियन ने बिल्कुल दबा दिया था और सारा मामला रफादफा कर दिया। अब जर्मनी अपर एटमॉस्फेयर में गया था। यूएसए दिल पर पत्थर रखकर यह बात झेल गया। लेकिन भाई साहब यूएसएसआर के ऊपर जाते ही तो अमेरिका के गुर्दे धुआं देने लगे और 1 साल बाद 1935 में अमेरिका ने 22 कि.मी. के रिकॉर्ड को तोड़ दिया और स्पेस को नया युद्ध का मैदान घोषित कर दिया। फिर 4 साल बाद 1 सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड को कूट दिया। इससे वर्ल्ड वॉर टू शुरू हो गया। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने स्पेस की पुस्तकें बंद कर दी और हथियार बनाने पर लग गए और 2 सितंबर 1945 को जापान के हैंड्स अप करते ही वर्ल्ड वॉर टू खत्म हुआ। जिसके बाद अमेरिका और सोवियत यूनियन ने वापस स्पेस की दुकान लगा दी।

आइए अब जरा आपको ये बताता हूं कि स्पेस में हथियार कैसे और क्यों फिट करे गए। देखो समय था 4 अक्टूबर 1957 का। सोवियत यूनियन की पहली सेटेलाइट स्पुतनिक वन अमेरिका के कान पर भिनभिना रही थी। अमेरिका डर गया। कितना डर गया ये आप इस वीडियो फुटेज से देखो। रोंग नेशनली दिस पीपल टू द प्रेस्ट पीपल यूनाइटेड स्टेट्स देबेट सिक्योरिटी थ्रू आउट द वर्ल्ड। अमेरिका में उस समय इतना जबरदस्त डर का माहौल था कि उस समय के राष्ट्रपति आइजन हावर ने तुरंत यह आदेश दिया कि भैया स्पेस डिपार्टमेंट वालों को बुलाओ। फिर भाई साहब के कान में किसी ने काम की बात डाली कि भैया अपना तो कोई स्पेस डिपार्टमेंट ही ना है। और इसी के बाद आइजन हावर ने नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एक्ट पर साइन किए। जिसकी वजह से 29 जुलाई 1958 को नासा की स्थापना हुई। वैसे अभी आपके दिमाग में यह सवाल भी आ रहा होगा कि इस मरियल सी सेटेलाइट से इतना डरने का कारण क्या था? मतलब दुनिया की पहली ही सेटेलाइट तो थी। ऐसा क्या खास लेकर उड़ रही थी ये? मतलब कोई तो ऐसी बात हो गई जिसकी वजह से अमेरिका ने तिल का पहाड़ बना दिया। देखो यह अमेरिका है। यह किसी भी बात का तिल का पहाड़ बना लेता है। लेकिन इस बार इसका डर सच्चा था और यह समझने के लिए बहुत ध्यान से सुनना। देखो आपको याद होगा कि जब हम लोग न्यूक्लियर टेस्ट किए थे, उस समय अमेरिका के सेटेलाइट हमारे सर पर मक्खियों की तरह भिनभिना रहे थे।

अब जरा यह सोचो कि आखिर यह वहां कर क्या रहे थे? जाहिर सी बात है जासूसी कर रहे होंगे, तस्वीरें खींच रहे होंगे। अब अगर यह बात मुझे समझ में आ सकती है, आपको समझ में आ सकती है तो क्या उस जमाने में अमेरिका को पता नहीं होगी? देखो, अमेरिका को लगता था कि सोवियत यूनियन के सेटेलाइट, उनके मिलिट्री इंस्टॉलेशन, उनकी साइंटिफिक डेवलपमेंट, टेस्ट साइट्स और सेंसिटिव एरियाज की जानकारी स्पेस में बैठे-बैठे जुटाते रहेंगे। और देखो एक बात बहुत अच्छे से समझ लीजिए। पूरी दुनिया में हर टेक्नोलॉजी का पहला इस्तेमाल हथियार बनाने के लिए ही होता है। भाई साहब हमारे और आपके जैसे आम लोगों को वो टेक्नोलॉजी तब दी जाती है जब हमारी मदद से उस टेक्नोलॉजी में कोई सुधार किया जा सके। मतलब एक उदाहरण देख लो। आप लोग चैट जीपीटी से अपने सवाल ही नहीं पूछते बल्कि जाने-अजाने उसे ट्रेन भी कर रहे हो। इसी ट्रेनिंग से वो और बेहतर बनेगा और कल को क्या पता हथियार की तरह भी इस्तेमाल हो। यह टॉपिक तो वैसे ही बहुत लंबा है। इस बारे में फिर कभी बात करेंगे। अभी के लिए जरा यह जानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति आखिर क्या कर रहा था? तो देखो अमेरिकी राष्ट्रपति ने नासा को बिल्कुल साफ-साफ बोल दिया कि मुझे स्पेस में हथियार भी चाहिए और अपने सेटेलाइट भी। अब सेटेलाइट तक तो ठीक था लेकिन स्पेस में हथियार कैसे टांगे? ये बहुत बड़ी समस्या थी और इसी में नासा उलझ गया। अच्छा अगर आपको साइंटिफिक स्टोरीज से मजा आता है तो आपने एक नाम जरूर सुना होगा एडवर्ड हेल। अगर नहीं सुना तो मैं बता देता हूं। इन्होंने 1869 में ही स्पेस में हथियार रखने का रास्ता खोज निकाला था। और यह वो जमाना था जिस समय स्पेस में जाने के बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था। इनकी एक बड़ी फेमस किताब है ब्रिक मून एंड अदर स्टोरीज। उसी में यह लिखा हुआ है कि स्पेस वेपन्स के लिए इंसानों को स्पेस में परमानेंट अड्डे बनाने पड़ेंगे। चलो अब जरा कहानी को थोड़ा फास्ट फॉरवर्ड करके चलते हैं। अब अप्रैल 12, 1961 में यूरी गैगरिन सोवियत यूनियन की तरफ से स्पेस में जाने वाले पहले इंसान बनते हैं। इसके अगले ही महीने यानी के 5 मई 1961 में अमेरिका ने एलेन शेपर्ड को स्पेस में भेज दिया और यह जनाब पहले अमेरिकन बने।

अब यह सब देखकर सोवियत यूनियन बोला, “अच्छा बेटा, ले तो अब अपन स्पेस वॉक करेगा और एलेक्सी लिनोव 18 मार्च 1965 में स्पेस वॉक करने वाले पहले इंसान बने।” अब यह सब देखकर अमेरिका के पेट में गैस हो गई। उसकी रातों की नींद उड़ गई। अमेरिका को लगा कि आज नहीं तो कल सोवियत यूनियन स्पेस में बम गोला या मिसाइल तो फिट करेगा जो घूम फिर कर उसी के सर पर आकर फूटेगा। अमेरिका को कुछ भी करके सोवियत यूनियन को स्पेस में हथियार ले जाने से रोकना था। अब अमेरिका ने अपनी सारी समस्या अपने चड्डी बड्डी यानी कि ब्रिटेन को बता दी। और भैया खुराफातियों के सरदार ब्रिटेन ने आईडिया दे दिया कि महाराज एक आउटर स्पेस ट्रीटी बनाओ। मतलब एक ऐसा समझौता बना लेते हैं कि कोई भी देश स्पेस में और स्पेस से केमिकल बायोलॉजिकल न्यूक्लियर हथियार ना तो चला पाए और ना ही ले जा पाए और समझौता बनकर तैयार हो गया। भाई साहब सिग्नेचर अभियान चलाया गया। सारे देशों ने सिग्नेचर करे और सोवियत यूनियन को भी मजबूरी में सिग्नेचर करने पड़े। लेकिन इन सब से अमेरिका का पेट नहीं भरा। उसने अपने डिफेंस एक्सपर्ट नासा के वैज्ञानिक और अपनी सुरक्षा से जुड़े हर एक ठेकेदार को बुला लिया और यह कहा कि कुछ भी करो पर स्पेस में अमेरिका के हथियार फिट करवाओ।

जेरी पोर्ननेल यह नाम याद रखिएगा। यही वो इंसान है जिसकी वजह से आज के समय स्पेस में हथियार पहुंच चुके हैं। अब जरा आगे बढ़ने से पहले इन भाई साहब की कुंडली भी जान लो। यह जनाब पहले आर्मी में थे। उसके बाद अपनी पढ़ाई लिखाई को अपडेट करके अमेरिका के डीआरडीओ यानी कि रैंड कॉरपोरेशन में उच्च कोटि के खुराफातियों के साथ उठने बैठने लगते हैं। मतलब जो लोग हथियार बनाने में मदद करते हैं उनके साथ मेलजोल बढ़ा लेते हैं और वहीं से इनके कानपुर में घंटियां बजती है। मतलब कान में बात आती है कि भैया सरकार ऐसा हथियार बनाना चाहती है जो आउटर स्पेस से चलाया जा सके और आउटर स्पेस समझौते की इज्जत भी बनी रहे। बस यह सब सुनते ही भाई साहब के दिमाग की बत्ती जल गई। अब इन्होंने अमेरिकी जनरल्स को याद दिलाया कि महाराज हमने वर्ल्ड वॉर वन में बोरी भर के लोहे की कील दुश्मन देश के सैनिकों के सर पर गिराई थी। तो क्यों ना यह आईडिया बड़े लेवल पर ट्राई कर लें। मतलब क्यों ना हम इस स्पेस से टंगस्टन की बड़ी-बड़ी रोड टेलीफोन पोल के साइज की रोड धरती की तरफ फेंक मारे और टंगस्टन एटमॉस्फेरिक फ्रिक्शन से पैदा हुए तापमान को भी बड़ी आसानी से झेल लेगा। अब इन रोड की काइनेटिक एनर्जी किसी छोटे न्यूक्लियर बॉम्ब की तरह भयंकर तबाही मचाएगी। अब इनके इस सुझाव पर बाकी वैज्ञानिकों ने हिसाब किताब के पर्चे जोड़ दिए। देखो भाई साहब, मैथ इज मैथ। यू कांट डिबेट विथ दैट। जो हिसाब किताब निकला था उससे इतनी एनर्जी पैदा हो रही थी जो छोटे न्यूक्लियर बम की तरह तबाही मचा सकती थी। अब इस वेपन को काइनेटिक एनर्जी वेपन कहा गया और इस प्रोजेक्ट को प्रोजेक्ट थर का नाम दिया गया। अब अमेरिका कुछ करे और उसकी भनक सोवियत यूनियन को ना लगे। ऐसा कैसे हो सकता था? तो सोवियत यूनियन को पता लग गया। मतलब सोवियत यूनियन वाले सोच रहे थे कि यार अमेरिका वाले तो बड़े हैं। मतलब हमें समझौते में फंसा गए और खुद स्पेस में हथियार टांगने निकल गए। देखो भैया, 1970 आते-आते अमेरिका ने दुनिया भर की सेटेलाइट स्पेस में टांग दी थी और क्योंकि कोल्ड वॉर का समय चल रहा था तो यह सेटेलाइट सोवियत यूनियन के ऊपर भिनभिना रही थी।

अब इन सेटेलाइट का काम था जासूसी करना। लेकिन सेटेलाइट के साथ एक समस्या थी। सेटेलाइट का कैमरा किसी निश्चित समय पर ही जमीन की तस्वीर उतार सकता था और यहां से सोवियत यूनियन के दिमाग में एक आईडिया आया कि स्पेस में क्यों ना एक परमानेंट अड्डा बना लिया जाए जिसे बाद में स्पेस स्टेशन का नाम दिया गया। और भाई साहब सोवियत यूनियन ने अपने स्पेस के इस अड्डे पर एक तोप लगा दी। मतलब असली की तोप कैनन लगा दी। सोवियत यूनियन यह डिसाइड कर चुका था कि अमेरिका की सेटेलाइट ने अगर जरा भी हैंकीपेंकी हरकत करी तो भाई साहब तोप का गोला मारेंगे और धज्जियां उड़ा देंगे। मतलब तुम्हारे टंगस्टन के खंभों की ऐसी की तैसी और इस तरीके से सोवियत यूनियन स्पेस स्टेशन पर एक तोप लेकर बैठ गया। यह पहली बार था जब किसी ने स्पेस में तोप लगाई थी और लगाई ही नहीं थी बल्कि चलाई भी थी। मतलब टेस्ट करी थी। अब देखो अमेरिका को खबर लग गई कि सोवियत यूनियन वाले भरे बैठे हैं। मतलब अगर अमेरिका के सेटेलाइट उनके पास गए तो भाई साहब टांग दिए जाएंगे तो अमेरिका वाले गए ही ना। कुछ हुआ ही ना। अब देखो अमेरिका और सोवियत यूनियन को ये बात समझ में आ चुकी थी कि स्पेस में जिसका अड्डा होगा वही राज करेगा। और यही वो कारण थे जिन्होंने स्पेस स्टेशन के कांसेप्ट को जन्म दिया। लेकिन आज के हालात देखते हुए अमेरिका, रशिया, भारत, चाइना सब के सब अपना खुद का स्पेस स्टेशन बनाने के लिए कमर कस चुके हैं। वैसे अगर आपको यह लगता है कि ये वहां पर सिर्फ धरती वासियों की भलाई के लिए काम करने जा रहे हैं। उनके उद्धार के लिए एक्सपेरिमेंट करेंगे तो जागो दर्शक जागो। असल में वहां पर क्या-क्या हो सकता है? अब जरा ये जानो। देखो आज के समय जिस दिन मैं यह वीडियो बना रहा हूं उस समय स्पेस स्टेशन का इतिहास लगभग 54 55 साल पुराना है।

अब जरा यह सोचो कि इंसान 55 सालों से स्पेस में बैठा है और हमें बस इतना ही पता लगा है कि स्पेस में सब्जियां कैसे उगेंगी। माइक्रो ग्रेविटी का इंसान की सेहत पर क्या फर्क पड़ेगा? मतलब आग कैसे बिहेव करेगी? 94% तक पानी को रिसाइकल कैसे करेंगे? इसके अलावा दो चार बातें और पता लग गई होंगी। लेकिन क्या 55 सालों में बस इतना ही पता लगा है? यह बात हजम नहीं हो रही या फिर सच्चाई कुछ और ही है और हमसे बहुत सारी जानकारी छुपा दी गई है। अब देखो सच क्या है यह तो स्पेस वाले जाने लेकिन ये लोग वहां पर क्या-क्या कर सकते हैं यह मैं आपको जरूर बता सकता हूं। भाई साहब स्पेस का यह अड्डा पूरी धरती को स्टोन एज में धकेल सकता है। आप स्पेस स्टेशन पर एक ईएमपी जनरेटर लगाओ। स्पेस में कोई बाउंड्री नहीं है। मतलब यह तामझाम किसी भी देश की सीमा के ऊपर उड़ सकता है। एक ईएमपी ब्लास्ट सारे सेटेलाइट खत्म। सारे के सारे पावर ग्रिड फेल। कम्युनिकेशन पूरी तरह से ठप, हॉस्पिटल शटडाउन, मिलिट्री पूरी तरह से बेबस। बैंकिंग सिस्टम कोलैप्स कर जाएंगे। मतलब किसी भी देश या पूरी धरती को मिनटों के अंदर स्टोन एज में धकेला जा सकता है। अमेरिका 1962 में स्टार फिश प्राइम टेस्ट करता है। उससे पैदा हुए ईएमपी ने उस जमाने में सारे इलेक्ट्रॉनिक्स फेल कर दिए थे। अमेरिका और रशिया दोनों इस तरीके के वेपन बना चुके हैं। लेकिन आज के समय वो वेपन कहां है यह किसी को नहीं पता। अब जरा यह सोचो कि अगर वह वेपन स्पेस में नहीं है तो भाई साहब वो बनाए ही क्यों गए हैं और यह तो कुछ भी नहीं।

स्पेस में बैठे-बैठे कहां पर बाढ़ लानी है, कहां सूखा लाना है, कहां तूफानों की दिशा बदलनी है और कहां पोलर जेट्स को डिस्टर्ब करना है? यह सारी चीजें आज के समय पॉसिबल हो चुकी हैं। और अगर नहीं तो इस टेक्नोलॉजी के पेटेंट्स रिस्चरर्स को कैसे मिल गए? आप यह देखिए एक पेटेंट तो यह रहा। मतलब कोई मुझे यह समझाए कि अगर इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना ही नहीं है तो इसे बनाया ही क्यों जा रहा है? ऐसी टेक्नोलॉजीस की मदद से धरती पर जनसंख्या को बड़े पैमाने पर कंट्रोल किया जा सकता है। यह लोग स्पेस में बायोवेपंस बना सकते हैं। वहां पर नए-नए वायरसेस को बनाया जा सकता है। बस ऊपर माइक्रो ऑर्गेनिज्म को बनाओ और किसी देश के पानी में छोड़ दो या वहां की हवा में छोड़ दो। यह अजीब सी बीमारियां कहां से आई? किसी को क्या ही पता चल पाएगा। यह सब कुछ मुमकिन है क्योंकि स्पेस में माइक्रोबायोलॉजी की स्टडीज शुरू हो चुकी है। और अब यह हाथ इस धरती को सवारने के लिए बढ़ रहे हैं या संघार के लिए यह वक्त बताएगा। मतलब स्पेस स्टेशन के 50-5 सालों में यूएसए और रशिया ने सिर्फ पेड़ पौधे उगाना सीखा है।

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